रांचीः झारखंड में सत्तारूढ़ झामुमो-कांग्रेस गठबंधन के बीच असम की राजनीति ने नई हलचल पैदा कर दी है। असम विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) द्वारा कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ने के फैसले ने महागठबंधन की एकजुटता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इस घटनाक्रम का असर अब झारखंड की सियासत में भी साफ तौर पर देखने को मिल रहा है।
इधर, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हालिया दिल्ली दौरे को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। उनके इस दौरे के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं, जिससे सियासी अटकलों का बाजार और गर्म हो गया है।
असम में झामुमो की नई रणनीति
असम में झामुमो ने 21 सीटों पर खास फोकस किया है। पार्टी की रणनीति चाय बागान से जुड़े आदिवासी समुदाय को साधने की है। झारखंड में अपने अनुभव और संगठनात्मक पकड़ के आधार पर झामुमो को उम्मीद है कि वह असम में भी अपनी पहचान मजबूत कर सकती है। तीर-कमान चुनाव चिन्ह को आदिवासी अस्मिता से जोड़कर पार्टी इसे अपनी ताकत के रूप में पेश कर रही है।
झारखंड की राजनीति पर संभावित असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर असम में झामुमो को सफलता मिलती है, तो झारखंड में कांग्रेस पर दबाव बढ़ सकता है। झामुमो की राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की रणनीति राज्य की गठबंधन राजनीति को नए मोड़ पर ला सकती है।
महागठबंधन की एकता पर सवाल
असम में झामुमो और कांग्रेस के बीच आई दरार को महागठबंधन के लिए चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। यह घटनाक्रम गठबंधन के भीतर मौजूद चुनौतियों को उजागर करता है और झारखंड की राजनीति में संभावित बदलाव के संकेत भी देता है।
वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस मुद्दे को लेकर सत्ताधारी गठबंधन पर निशाना साधा है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ भरोसेमंद साझेदार साबित नहीं हुई है और यह दरार उसी का परिणाम है।