Ranchi: झारखंड सरकार ने राज्य में स्थानीय स्वशासन व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में अहम कदम उठाया है। पंचायती राज विभाग ने झारखंड पंचायती राज अधिनियम, 2001 की व्यापक समीक्षा के लिए राज्य स्तरीय उच्च समिति का गठन किया है। इस संबंध में विभाग की ओर से आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी गई है।
गठित समिति में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों और अनुभवी अधिकारियों को शामिल किया गया है। हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश रत्नाकर भेंगरा को विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। इसके अलावा पंचायत राज निदेशालय के निदेशक, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी विनोद किस्पोट्टा, डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण अनुसंधान संस्थान के उपनिदेशक, ग्रामीण विकास और विधि विभाग के प्रतिनिधि, पेसा जिलों के दो उप विकास आयुक्त, पूर्व जिला पंचायती राज पदाधिकारी प्रेमतोष चौबे, सलाहकार सज्जाद मजीद और शैलेन्द्र कुमार सिंह, राज्य पेसा समन्वयक सुधीर कुमार पाल, अधिवक्ता रश्मि कात्यायन, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रामचन्द्र उरांव और सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला को समिति में जगह दी गई है।
समिति को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का लक्ष्य दिया गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य अधिनियम के मौजूदा प्रावधानों की समीक्षा कर उन्हें वर्तमान जरूरतों के अनुरूप बनाना है। साथ ही ग्राम सभा और त्रिस्तरीय पंचायतों के अधिकारों व जिम्मेदारियों को और स्पष्ट एवं मजबूत करने के सुझाव देना भी समिति की जिम्मेदारी होगी।
इसके अलावा खनिज संसाधन, लघु वनोपज, भूमि अधिग्रहण और सामाजिक न्याय से जुड़े प्रावधानों के संदर्भ में अधिनियम की प्रासंगिकता सुनिश्चित करने पर भी समिति विशेष ध्यान देगी। समिति को आवश्यक संशोधनों के साथ एक ड्राफ्ट अमेंडमेंट बिल तैयार कर तीन महीने के भीतर पंचायती राज विभाग को सौंपना होगा।
सरकार की इस पहल से उम्मीद की जा रही है कि राज्य में पंचायतों को जमीनी स्तर पर अधिक अधिकार, स्पष्टता और मजबूती मिलेगी, जिससे ग्रामीण शासन व्यवस्था और सशक्त हो सकेगी।