Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि विभागीय जांच कानूनी रूप से सही भी हो, तब भी औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत लेबर कोर्ट या औद्योगिक न्यायाधिकरण को यह जांचने का अधिकार है कि कर्मचारी को दी गई सजा उसके अपराध की गंभीरता के अनुपात में है या नहीं।
न्यायमूर्ति दीपक रौशन की एकलपीठ ने प्रबंधन की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें वर्ष 2008 में लेबर कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी गई थी।
क्या है मामला
मामला वर्ष 1983 का है। एक कंपनी के कर्मचारी सी.के. सिंह का अपने ही नियोक्ता के अस्पताल में ऑपरेशन हुआ था। ऑपरेशन के दौरान उनके शरीर के अंदर टांका छूट जाने के कारण उन्हें गंभीर संक्रमण और असहनीय दर्द का सामना करना पड़ा।
जब वे दोबारा इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर ने कथित रूप से उपचार करने से मना कर दिया। दर्द से परेशान कर्मचारी ने विरोध जताया, जिसे प्रबंधन ने अभद्र व्यवहार मानते हुए 18 जून 1984 को उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया।
अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि असहनीय दर्द में किसी मरीज की प्रतिक्रिया देना अस्वाभाविक नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब उसे इलाज देने से मना कर दिया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि अगर यही मामला किसी वरिष्ठ अधिकारी से जुड़ा होता तो संभवतः डॉक्टर के खिलाफ मेडिकल लापरवाही का मामला बनता और मुआवजा दिया जाता।
कोर्ट का आदेश
अदालत ने औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 11A का हवाला देते हुए कहा कि लेबर कोर्ट केवल जांच की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी देख सकता है कि कर्मचारी को दी गई सजा अत्यधिक तो नहीं है और उसका पूर्व सेवा रिकॉर्ड कैसा रहा है।
इस मामले में कर्मचारी का 14 वर्षों का सेवा रिकॉर्ड बेदाग था और उनकी बीमारी की स्थिति को नजरअंदाज किया गया था। सुनवाई के दौरान सी.के. सिंह का निधन हो चुका है। ऐसे में हाईकोर्ट ने मानवीय आधार पर आदेश दिया कि उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को अवार्ड की तारीख से लेकर मृत्यु या सेवानिवृत्ति तक का पूरा बकाया वेतन दिया जाए।