झारखंड में SIR को लेकर सियासत गर्म है… और सरना धर्म कोड की मांग एक बार फिर उफान पर..क्या है पूरा मामला? किसका क्या आरोप? और आम जनता पर क्या असर? आज हम इस पूरे विवाद की असली कहानी आसान भाषा में समझेंगे… वीडियो को आखिर तक जरूर देखें। सबसे पहले बात करते हैं SIR यानी Special Intensive Revision की…जिसका मतलब है - मतदाता सूची का स्पेशल और गहन पुनरीक्षण। लेकिन… इसी प्रक्रिया की वजह से झारखंड की राजनीति हिल गई है। कांग्रेस और झामुमो का कहना है कि SIR का इस्तेमाल भाजपा को फायदा पहुँचाने के लिए किया जा रहा है।
स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी तो यहां तक कह रहे हैं ki ‘ये वोट चोरी की कोशिश है… जनता के अधिकार छीने जा रहे हैं।’ और इसी मुद्दे पर झारखंड विधानसभा में प्रस्ताव भी पास कराया गया… यानी मामला काफी गंभीर हो चुका है।” नेताओं का कहना है— अगर SIR जबरन लागू हुआ…तो बड़ा आंदोलन होगा और चुनाव के बहिष्कार तक की बात उठ रही है।” दूसरी तरफ भाजपा का आरोप बिलकुल पलट है…”भाजपा कहती है— ‘जो SIR का विरोध कर रहे हैं, वे अवैध घुसपैठियों के वोट पर निर्भर हैं।’ यानि SIR लागू हुआ तो फर्जी नाम हटेंगे गैरकानूनी मतदाता डिलीट होंगे और चुनाव ज्यादा ‘क्लीन’ होगा
“अब दोनों तरफ से आरोप–प्रत्यारोप का दौर जारी है…और जनता बीच में उलझी हुई।” अब आते हैं उस मुद्दे पर… जो सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि पहचान और आत्मसम्मान से जुड़ा है।” आदिवासी समाज चाहता है कि जनगणना में‘Sarna Religion Code’अलग से जोड़ा जाए। उन्हें हिंदू या किसी अन्य धर्म के तौर पर नहीं दिखाया जाए। यह उनकी संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व का प्रतीक है। झामुमो और कांग्रेस ने इस मुद्दे पर पूरा समर्थन दिया है। राज्य सरकार ने केंद्र को प्रस्ताव भी भेजा,लेकिन अभी तक मंजूरी नहीं मिली है।
और यही मुद्दा RSS और आदिवासी नेताओं के बीच टकराव पैदा करता है…क्योंकि कुछ संगठन आदिवासियों को हिंदू मानते हैं,जबकि बड़ा हिस्सा खुद को सarna धर्म से जोड़ता है।” “एक तरफ SIR को लेकर राजनीतिक आग… दूसरी तरफ सरना कोड को लेकर पहचान की लड़ाई…और इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल है, इसका असर झारखंड की आम जनता और आने वाले चुनाव पर क्या होगा?”