भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों तक सीमित है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति ईसाई या मुस्लिम धर्म अपनाता है, तो उसे SC से जुड़े आरक्षण और अन्य कानूनी संरक्षण, जैसे SC/ST एक्ट का लाभ नहीं मिलता।
इस फैसले के बाद विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ वर्गों ने इसे संविधान की भावना के अनुरूप बताते हुए समर्थन किया है, वहीं कुछ लोगों ने इसे सामाजिक अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बताया है।
आदिवासी समाज से जुड़े कई प्रतिनिधियों का कहना है कि उनकी पारंपरिक जीवनशैली, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक पहचान अलग है। उनका मानना है कि जो लोग अपनी परंपराओं और मूल पहचान को छोड़ते हैं, उन्हें जनजातीय समाज को मिलने वाले अधिकारों का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
वहीं, कुछ सामाजिक संगठनों ने केंद्र सरकार से अनुच्छेद 342 में संशोधन कर अनुसूचित जनजाति (ST) से जुड़े प्रावधानों को और स्पष्ट करने की मांग भी उठाई है, ताकि भविष्य में इस तरह के विवादों से बचा जा सके।
फिलहाल, यह मुद्दा कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बहस का विषय बना हुआ है और आने वाले समय में इस पर और व्यापक चर्चा की संभावना है।