रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारी हितों से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पेंशन किसी भी कर्मचारी का अधिकार है, न कि खैरात। अदालत ने कहा कि केवल एक घटना या मामूली अनियमितता के आधार पर किसी कर्मचारी की पेंशन में कटौती करना न्यायसंगत नहीं है।
यह मामला जल संसाधन विभाग के सेवानिवृत्त जूनियर इंजीनियर ब्रजेश्वर सिंह से जुड़ा है। उन पर वर्ष 2003-04 में माइक्रोलिफ्ट योजनाओं में वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे थे। सेवानिवृत्ति के बाद राज्य सरकार ने झारखंड पेंशन नियम 2000 के तहत कार्रवाई करते हुए उनकी पेंशन में पांच साल तक 15% कटौती का आदेश दिया था।
इस फैसले के खिलाफ ब्रजेश्वर सिंह ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ में हुई। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि जांच में कर्मचारी दोषी पाए गए थे और उनकी सेवा संतोषजनक नहीं थी, इसलिए पेंशन में कटौती उचित है।
वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनके खिलाफ न तो विधिवत विभागीय जांच हुई और न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया गया। साथ ही मामला भी काफी पुराना था।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को सही ठहराते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पेंशन में कटौती जैसे कठोर फैसले के लिए पूरे सेवा रिकॉर्ड का समग्र मूल्यांकन जरूरी है। इस मामले में न तो गंभीर कदाचार साबित हुआ और न ही उचित प्रक्रिया का पालन किया गया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपों या छोटी अनियमितताओं के आधार पर पेंशन में कटौती नहीं की जा सकती, जब तक कि विधिवत जांच में गंभीर दोष साबित न हो जाए।